Monday, 21 January 2013

वायरलैस नेटवर्क

वायरलैस नेटवर्क  के इस्तेमाल से पहले बरतें सावधानी

इस्तेमाल की सुविधा और रखरखाव में आसानी के लिहाज से वायरलैस ब्रॉडबैंड नेटवर्क की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। इनका इस्तेमाल करने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन सामान्य नेटवर्क की तुलना में ऐसे कनेक्शनों में सुरक्षा के लिहाज से ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है।  अपने वायरलैस ब्रॉड़बैंड कनेक्शन को गलत तत्वों की निगाहों और पहुंच से बचाने के लिए कुछ बुनियादी सावधानियां बरतने की जरूरत है। मसलन राउटर की जगह का चुनाव। वायरलैस राउटर को खिड़कियों या दरवाजों के आसपास नहीं बल्कि किसी केंद्रीय स्थान पर इन्स्टाल करें। आपके नेटवर्क के सिग्नल आसपास के घरों और दफ्तरों तक भी पहुंचते हैं जिसे ‘सिग्नल लीकेज’ कहा जाता है। यदि राउटर के तीन तरफ दीवारें हैं या वह घर-ऑफिस के बीचोंबीच लगा हुआ है तो इस तरह के लीकेज को रोका जा सकता है।  ज्यादातर यूज़र्स के वायरलैस राउटर का एडमिनिस्ट्रेटिव यूजऱनेम और पासवर्ड ‘एडमिन’ होता है। आपके राउटर में यह पहले से ‘फीड’ किया हुआ आता है। अगर अपने नेटवर्क को ‘हैकर्स’ की पहुंच से बचाना चाहते हैं तो अपना पासवर्ड जरूर बदल लें। जितना मुश्किल पासवर्ड हो, उतना अच्छा। आधुनिक वायरलैस राउटर्स में ‘फायरवाल’ मौजूद होती है जो उनके अनधिकृत प्रयोग और घुसपैठ को रोकती है। हालांकि ज्यादातर राउटर्स में वह ‘निष्क्रिय’ अवस्था में होती है। नेटवर्क स्थापित करते समय राउटर के फायरवॉल को ‘सक्रिय’ करना न भूलें। साथ ही साथ उससे जुडऩे वाले सभी कंप्यूटरों में एंटी-वायरस सॉटवेयर इन्स्टाल करें। अगर आपका वायरलैस नेटवर्क लंबे समय तक इस्तेमाल नहीं किया जाना है तो निष्क्रियता की अवधि में अपना राउटर भी बंद कर दें, जैसे हर रात।
अभेद्य बनाएं अपना नेटवर्क
- हर कंप्यूटर और हर डिजिटल डिवाइस की पहचान करने वाली एक ‘पहचान संख्या’ होती है जिसे ‘मैक एड्रेस’ कहते हैं। आप अपना वायरलैस नेटवर्क स्थापित करते समय उन कंप्यूटरों के ‘मैक एड्रेस’ पहले ही फीड कर सकते हैं जो उससे कनेक्ट होंगे। यह दूसरे कंप्यूटरों, मोबाइलों या अन्य अनधिकृत डिवाइसेज को आपके नेटवर्क से जुडऩे से रोकेगा।
- अपने वायरलैस नेटवर्क में ‘एनक्रिप्शन’ को जरूर ‘सक्रिय’ कर दें। एनक्रिप्शन दो तरह का होता है- वाई-फाई प्रोटेक्टेड एक्सेस (डब्लूपीई) और वायर्ड इक्विवेलेंट प्राइवेसी (डब्लूईपी)। इनमें से पहली श्रेणी वाला ‘एनक्रिप्शन’ लगभग अभेद्य है। आम तौर पर वायरलैस नेटवर्क स्थापित करने वाले इंजीनियर ‘डब्लूईपी’ को सक्रिय करते हैं जिसे भेदना अपेक्षाकृत आसान है। इसके लिए अमूमन ’12345एबीसीडीई’ या ’1ए2बी3सी4डी5ई’ जैसी सामान्य कुंजियों (सिक्यूरिटी की) का प्रयोग किया जाता है जिसका अंदाजा कोई भी हैकर आसानी से लगा सकता है। आप यह गलती न करें।
- आपके वायरलैस नेटवर्क का एक ‘नाम’ भी होता है जिसे एसएसआईडी (सर्विस सेट आइडेन्टीफायर) कहा जाता है। नेटवर्क स्थापित होते समय इसका एक सामान्य सा नाम (अमूमन राउटर का ब्रांड नाम) सुझाया जाता है जिसे ज्यादातर यूजऱ ज्यों का त्यों इस्तेमाल कर लेते हैं। आप ऐसा न करें। अपने नेटवर्क को उचित नाम (एसएसआईडी) दें- जैसे ‘विकासहोम’ या ‘नवीनऑफिस’।
- वायरलैस नेटवर्क से जुडऩे वाले सभी कंप्यूटरों का आईपी एड्रेस (नेटवर्क पर पहचान के लिए दी जाने वाली खास पहचान संख्या) भी होती है। यह ‘मैक एड्रेस’ से अलग है। हर नेटवर्क ‘डीएचसीपी’ सुविधा के जरिए इन कंप्यूटरों को हर बार नया आईपी एड्रेस देने में सक्षम है। लेकिन यह सुविधा एक दुधारी तलवार है जिसके जरिए अवांछित तत्व भी आपके नेटवर्क से कनेक्ट होने के लिए वैध ‘आईपी एड्रेस’ हासिल कर सकते हैं। अगर हो सके तो ‘डीएचसीपी’ के स्थान पर अपने नेटवर्क के हर कंप्यूटर को ‘मैनुअली’ ‘आईपी एड्रेस’असाइन करें।

राउटर क्या है |

 

                                     
 राउटर एक नेटवर्किंग उपकरण है जिसका प्रयोग कई नेटवर्कों का जोड़ने के लिए किया जाता है । इसका प्रयोग विभिन्न मार्गों (रूट) तक पहुचने और उनका पता लगाने के लिए किया जाता है । यह द्वितीय स्तर के विभिन्न उपकरणों के बीच एक सेतु का काम भी करता है ।
राउटर की सुरक्षा:
यदि आप इंटरनेट के लिए अपने घर पर या दतर पर वाई.फाई राउटर प्रयोग करते हैं तो उसकी सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद रखें नहीं तो आपके वाई.फाई राउटर का दुष्प्रयोग संभव है।
अभी पिछले दिनों भारत के कुछ बड़े शहरों में आतंकवादियों ने बम ब्लास्ट किए और सैकड़ों मासूमों की जानें लीं॰ इस घिनौने कार्य को अंजाम देने में उन्होंने नवीनतम तकनीक और इंटरनेट का भरपूर उपयोग किया। पकड़ में आने से बचने के लिए आतंकवादियों ने इंटरनेट के असुरक्षित, आम या अनजाने में उपलब्ध वाई.फाई तंत्र का बेधड़क उपयोग किया। जब जांच एजेंसियों ने इंटरनेट एक्सेस पाइंट, जहां से आतंकवादियों के धमकी भरे ईमेल भेजे गए थे, वहां धावा बोला तो पाया कि वहां तो निदोर्ष और बेकसूर नागरिक रह रहे हैं। उनका दोष सिर्फ इतना था कि वे अपने घर व दफ्तरों में इंटरनेट के लिए वाई.फाई तंत्र का प्रयोग कर रहे थे, जिसमें सुरक्षा नाम की चीज ही नहीं थी।
यदि आप इंटरनेट के लिए अपने घर पर या दतर पर वाई.फाई राउटर प्रयोग करते हैं तो उसकी सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद रखें नहीं तो आपके वाई.फाई राउटर का प्रयोग करते हुए न सिर्फ आतंकवादी बल्कि अन्य गैर.कानूनी गतिविधियाँ भी अंजाम दी जा सकती हैं और आपको अपने आपको बेकसूर सिद्ध करने में अनावश्यक पसीना बहाना होगा। वाई.फाई की सुरक्षा के लिए आप कुछ निम्न उपाय आजमा सकते हैं।
वाई.फाई कनेक्शन पासवर्ड से सुरक्षित रखें। लैपटएप का जमाना आ चुका है। वे सस्ते भी हो गए हैं और सुविधा सम्पन्न भी। आमतौर पर आजकल हर एक लैपटएप वाई.फाई से लैस आता है। लैपटएप पर वाई.फाई के जरिए इंटरनेट एक्सेस करना अत्यंत सहूलियत भरा होता है। और आमतौर पर नए.पुराने सभी इंटरनेट प्रयोक्ता वाई.फाई ब्रएडबैण्ड डीएसएल, एडीएसएल मएडम का प्रयोग करने लगे हैं। कई दफा आवश्यकता न होने पर भी सामान्य नेटवर्क तार युक्त मएडम के बजाए वाई.फाई युक्त मएडम इंटरनेट सेवा.प्रदाताओं द्वारा लगा दिया जाता है। ऐसी स्थिति में इंटरनेट सेवा प्रदाता से कहें कि वे वाई.फाई मएडम में कनेक्शन एक्सेस करने के लिए सुरक्षित और कठिन पासवर्ड सेट करें॰ बिना पासवर्ड के आपका वाई.फाई एक्सेस न हो पाए ये ध्यान रखें। यदि आपका लैपटएप बिना पासवर्ड के वाई.फाई इंटरनेट एक्सेस कर ले रहा है तो सबसे पहला काम ये करें कि अपने वाई.फाई राउटर में स्वयं या जानकार व्यक्ति से या अपने इंटनरेट सेवा प्रदाता से पासवर्ड डलवाएं।
बहुत से क्षेत्रों में मसलन होटल, एयरपोर्ट लाउंज, विश्वविद्यालय कैंपस इत्यादि में आमजनों की सहूलियत के लिए मुफ्त वाई.फाई एक्सेस उपलब्ध होता है। यानी कोई भी व्यक्ति अपना लैपटएप या वाई.फाई सक्षम मोबाइल उपकरण जैसे कि स्मार्ट फोन इत्यादि वहाँ ले जाकर बिना पासवर्ड इत्यादि के इंटरनेट एक्सेस कर सकता है। जाहिर है इस तरह के इंटरनेट एक्सेस असुरक्षित ही होते हैं। कुछ शरारती तत्व ऐसे में उस क्षेत्र में अधिक शक्तिशाली वाई.फाई उपलब्ध कर आपके लैपटएप को अपने राउटर के जरिए कनेक्ट करवा सकते हैं और इस तरह से वे आपके लैपटएप के डाटा और सामग्री पर पहुंच बना सकते हैं। इसे शैतानी जुड़वां हमला (एविल ट्विन अटैक या मैन इन द मिडिल अटैक) कहा जाता है॰ अत: ऐसे स्थलों पर अपने लैपटएप को असुरक्षित वाई.फाई इंटरनेट कनेक्शन से अत्यंत आवश्यकता होने पर ही जोड़ें और काम समाप्त होने पर शीघ्रता से कनेक्शन बंद करें।
वाई.फाई हमेशा चालू न रखें। प्राय: यह देखा गया है कि लैपटएप का या ब्रएडबैण्ड राउटर का वाई.फाई हमेशा चालू रहने दिया जाता है। इंटरनेट पर काम हो रहा हो या नहीं, वाई.फाई अनावश्यक चालू रहते हैं। इससे एक नुकसान तो यह होता है कि अनावश्यक सिगनल जनरेट करने के कारण यह आपके लैपटएप की बैटरी जल्दी समाप्त करता है, वहीं बिजली भी अनावश्यक खर्च होती है। साथ ही हमेशा वाई.फाई चालू रहने से उसकी सुरक्षा को भेदने के खतरे हमेशा बने रहते हैं। अत: जब भी वाई.फाई का प्रयोग नहीं हो रहा हो, तो वाई.फाई बन्द रखें। इसके लिए प्राय: सभी लैपटएप में एक बटन होता है। ब्रएड बैण्ड राउटरों को सीधे स्विच अएफ कर सकते हैं।
. बाहर के असुरक्षित मुफ्त वाई.फाई इंटरनेट कनेक्शनों के जरिए आप बेहद सुरक्षित इंटरनेट के कार्य जैसे कि अपने अएनलाइन बैंक खाते से जमा.निकासी करना या क्रेडिट कार्ड से खरीदारी करना इत्यादि कतई न करें। वचुर्अल प्राइवेट नेटवर्क जैसे सुरक्षित माने जाने वाले वाई.फाई कनेक्शन भी कई मर्तबा सुरक्षित नहीं रह पाते एवं उनमें सेंघ लगने के कई उदाहरण हैं। जाहिर है, ऐसे कायोंर् के लिए घर या दफ्तर का पासवर्ड सुरक्षित, नेटवर्क तार वाला इंटरनेट ही सवरधिक सुरक्षित होता है। अत: जहां तक हो सके ऐसे कायोंर् के लिए वाई.फाई इंटरनेट के बजाए नेटवर्क तार कनेक्शन वाला इंटरनेट प्रयोग करें।
. यदि आप आमतौर पर मोबाइल रहते हुए इंटरनेट का प्रयोग करते हैं तो सुरक्षा के लिहाज से सलाह दी जाती है कि आप मुत उपलब्ध वाई.फाई इंटरनेट का प्रयोग करने के बजाए वायरलेस. सीडीएमए, जीपीआरएस, 3जी यूएसबी मएडम कार्ड के जरिए मोबाइल, इंटरनेट सेवा प्रदाताओं द्वारा उपलब्ध किया जा रहा सुरक्षित इंटरनेट खाता प्रयोग करें।
. यदि आप तकनीकी रुप से सक्षम हैं (आप किसी तकनीकी दक्ष नेटवर्क इंजीनियर की सहायता भी ले सकते हैं) तो अपने वाई.फाई ब्रएडबैण्ड राउटर के डिफएल्ट नाम व उपयोक्ता नाम व पासवर्ड को फर्मवेयर को एक्सेस कर बदल दें॰ पासवर्ड नियमित अंतराल में बदलते रहें।
. स्वचालित कनेक्शन अक्षम करें। अपने कम्प्यूटर के वाई.फाई से स्वचालित जुड़ने के विकल्प को अक्षम कर दें। स्वचालित जुड़ने के विकल्प से आपको पता ही नहीं होता कि कम्प्यूटर किस किस वाई.फाई कनेक्शन से कब.कब जुड़ गया और कब डिस्कनेक्ट हो गया। सुरक्षा के लिहाज से आपको पता होना चाहिए कि आपको किस नेटवर्क से कब जुड़ना है। वायरलेस कनेक्शन को हमेशा जब जरूरत हो, थोड़ी सी असुविधा तो होगी, मगर स्वयं चालू करें। और काम समाप्त होने पर तत्काल बंद कर दें।
उम्मीद है उक्त सुरक्षा उपायों को अपना कर न सिर्फ आप स्वयं सुरक्षित रहकर इंटरनेट प्रयोग कर सकेंगे, बल्कि अपने देश की भी सुरक्षा में सहयोग दे सकेंगे।
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जानिए कम्प्यूटर को !


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आज का युग कम्प्यूटर का युग है.आज कम्प्यूटर किसी ना किसी रूप में हमारे जीवन से जुड़ा हुआ है. ऐसे में मस्तिष्क में कई बार यह प्रश्न उठता है कि आखिर कम्प्यूटर है क्या? आइये इसी प्रश्न का उत्तर ढूंढने का प्रयास करते हैं.कम्प्यूटर एक ऐसा यंत्र,औजार या डिवाइस (device) है जो हमारे द्वारा दिये गये आंकड़ों (डाटा) को ग्रहण कर उस पर हमारे द्वारा दिये गये निर्देशों के अनुसार काम करता है और हमें इच्छित परिणाम प्रदान करता है. जिन निर्देशों के आधार पर कम्प्यूटर काम करता है उन्हें हम प्रोग्राम (Program) कहते हैं.हिन्दी में कम्प्यूटर को संगणक भी कहा जाता है.कई बार कम्प्यूटर के लिये हम लोग पी.सी. (P.C) शब्द का भी प्रयोग करते हैं. पी.सी. एक अंग्रेजी शब्द है जिसका मतलब होता है पर्सनल कम्प्यूटर (Personal Computer) यानि व्यक्तिगत कम्प्यूटर.आपने शेयर्ड कम्प्यूटर (Shared Computer) का नाम भी सुना होगा.शेयर्ड कम्प्यूटर वह है जिसे कई भिन्न-भिन्न लोग उपयोग करते हैं.विशेष रूप से इसका तात्पर्य उस कम्प्यूटर से है, जो सार्वजनिक या साझा पहुँच के लिए उपलब्ध हों. जैसे शालाएँ, पुस्तकालय, इंटरनेट और गेमिंग कैफ़ेज़ और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर पाए जाने वाले कम्प्यूटर.
कम्प्यूटर के संबंधित शब्दों से परिचय
कम्प्यूटर के विषय में और अधिक जानने से पहले आइये कम्प्यूटर से संबंधित तकनीकी शब्दावली से परिचित हो लें.

डाटा क्या है? (What is Data?)

आपने डाटा शब्द बहुत बार सुना होगा. इसका शाब्दिक अर्थ है आंकड़े लेकिन कम्प्यूटर के क्षेत्र में यह विभिन्न अर्थों में प्रयुक्त होता है.इसका अर्थ है कुछ तथ्य,अंक और सांख्यिकी का समूह, जिस पर प्रक्रिया करने से अर्थपूर्ण सूचना प्राप्त होती है.जैसे आप किसी स्थान के पूरे महीने के तापमान के आंकड़े एक जगह रखें तो वह मासिक तापमान का आंकड़ा होगा, यानि टैम्परेचर डाटा.कभी कभी डाटा को रॉ डाटा (Raw Data) भी कहा जाता है.इसका मतलब हुआ ऐसा डाटा जिस पर अभी कोई भी प्रक्रिया नहीं हुई है. लेकिन डाटा शब्द का उपयोग हमेशा गणितीय आंकड़ों के सन्दर्भ में ही हो यह कोई आवश्यक नहीं. अक्सर चित्र (Image) , वीडियो फाइल (Video File),फोटो (Photo),डोक्यूमैंट (Documents) आदि भी डाटा कहे जाते हैं.

प्रक्रिया क्या है ? (What is Process?)

डाटा जैसे- अक्षर, अंक, सांख्यिकी या किसी चित्र को सुव्यवस्थित करने या उनकी गणना करने को प्रक्रिया कहते हैं. किसी भी डाटा को अर्थपूर्ण जानकारी में बदलने के लिये उसे प्रक्रिया से गुजरना पड़ता हैं. इसके बाद इसे विभिन्न व्यक्ति (जिन्हें सूचना की आवश्यकता है) अपने अपने कार्य के अनुसार प्रयोग कर सकते हैं. जैसे यदि हम पिछ्ले उदाहरण के मासिक तापमान के डाटा की बात करें तो इस डाटा पर प्रक्रिया कर यह पता लगा सकते हैं इस महीने सबसे अधिक तापमान या सबसे कम तापमान क्या रहा या इस महीने का औसत तापमन क्या था.प्रक्रिया में निम्नालिखित पदो का समावेश होता है.
गणना :- जोडना, घटाना, गुणा करना, भाग देना,औसत करना.
तुलना :- बराबर, बड़ा,छोटा, शून्य, धनात्मक,ऋणात्मक.
निर्णय लेना (Decision Making) :- किसी शर्त या तर्क के आधार पर विभिन्न निर्णय लेना.

तर्क (Logic):- आवश्यक परिणाम को प्राप्त करने के लिए पदों का क्रम.
प्रक्रिया केवल संख्याओं (अंकों) की गणना को ही नहीं कहते हैं बल्कि कम्प्यूटर की सहायता से दस्तावेजों में त्रुटियाँ ढ़ूंढ़ना, टैक्ट को व्यवस्थित करना जैसे कई काम भी प्रक्रिया कहलाते हैं.

                                                                                                  लेख- कार्तिकेय पाठक
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वेबसाइट बनाने का अभ्यास (Website Design Practice)

 

Posted On सोमवार, जनवरी  21, 2012 By कार्तिकेय पाठक . Under अपना वेबसाइट/ब्लोग बनाएँ (Website/Blog Tutorial)  Tags: ब्लोग, वेबसाइट, Blog, Website

वेब डिजाइन मार्गदर्शिका (Web Design Guide)
हिन्दी में वेब डिजाइन ट्यूटोरियल (Web Design Tutorial in Hindi)

वेबसाइट बनाने का अभ्यास (Website Design Practice)
उम्मीद है कि अब तक आप किसी ऐसे वेबसाइट के सदस्य बन गये होंगे जो कि मुफ्त का सब डोमेन नेम (sub domain name) तथा प्रकाशन स्थान (webhosting) उपलब्ध कराते है। यदि आप HTML या किसी प्रकार का कोडिंग करना नहीं आता तो भी चिन्ता की कोई बात नहीं है, निश्चिन्त रहिये क्योंकि प्रायः ये सभी वेबसाइट आपको एचटीएमएल एडीटर्स (HTML Editors) की सुविधा भी प्रदान करते हैं जो कि आपके द्वारा टाइप की गई सामग्री (content) को स्वतः ही एचटीएमएल कोड्स (HTML codes) में परिवर्तित कर देते हैं।
तो अब देर किस बात की है वेबसाइट बनाने का अभ्यास शुरु कर दीजिये। जो कुछ भी मन में आये, टाइप करें, वाक्य बनायें, पैराग्राफ बनायें, सारिणी (tables) बनायें, ग्राफिक्स (graphics), ध्वनि (sound) तथा एनीमेशन्स (animetions) का प्रयोग करें। मतलब यह कि जो मन में आये करें और अपने बनाये वेब पेज (web page) को वेब ब्राउसर (web browser) में देखें। आखिर यह केवल अभ्यास ही तो है। पसंद न आने पर सब कुछ मिटा (delete) करके फिर से कुछ नया बनायें।
इस प्रकार से लगातार अभ्यास करते रहें क्योंकि कहा गया है किः
करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात ते सिल पर परत निसान॥
तो निष्कर्ष यह है कि अभ्यास करते रहें।
  • कुछ भी, जो भी मन को भाये, बनायें……..
  • फिर मिटा दें……..
  • फिर कुछ नया बनायें……..
  • फिर मिटा दे……..
  • अभ्यास……..
  • और अभ्यास……..
  • और अभ्यास……..
  • केवल अभ्यास……..
  • निरन्तर अभ्यास……..
हमें पूर्ण विश्वास है कि इस प्रकार अभ्यास करते रहने से अन्ततः आप एक सुन्दर, मोहक, सभी को पसंद आने वाला वेब पेज (web page) अवश्य ही बना लेंगे। आप स्वयं देखेंगे कि हमारा यह विश्वास बिल्कुल सही है।
                                                     लेख- कार्तिकेय पाठक








टीम व्यूअर

टीम व्यूअर – एक उपयोगी सॉफ्टवेयर

Posted On monday, January  21, 2012 By कार्तिकेय पाठक . Under इंटरनेट सुविधाएँ  Tags: टीम व्यूअर
 
लेखः कार्तिकेय पाठक
आइये जानते है एक बहुत ही शानदार और उपयोगी सॉफ्टवेर के बारे में! मान लीजिए आप एक कंप्यूटर एक्सपर्ट है और आप का दोस्त केवल कम्प्यूटर चला सकता है किन्तु उसके बारे में उसे बहुत कम जानकारी है। आपका उस दोस्त के कंप्यूटर सॉफ्टवेयर में कुछ समस्या है और वो आपसे काफी दूर बैठा है। आप उसे कैसे ठीक करेंगे? या फिर कोई बड़ी वीडियो या ऑडियो या डॉकुमेंट फाइल है जिसका साइज बड़ा होने के कारण आप उसे मेल नहीं कर पा रहे है। ऐसे में आप को उसे पेन ड्राईव में या सीडी में ले जाना होता है और उसको बाई हैण्ड या कोर्रियर से भेजना होता है। या फिर अपना कोई कंप्यूटर प्रजेंटेसन देना हो वो भी अब संभव है। एक ही जगह बैठे-बैठे आप अपने मित्र का कंप्यूटर ठीक भी कर सकते है और बड़े साइज के फाइल भी भेज सकते है, अपने कंप्यूटर के द्वारा आप अपने दोस्त को दूर बैठे-बैठे कंप्यूटर या कंप्यूटर सॉफ्टवेर सिखा भी सकते है। एक फ्री के सॉफ्टवेर से जो की घरेलु इस्तेमाल के लिए फ्री डाउनलोड किया जा सकता है। इस सॉफ्टवेर को कहते है ‘टीम व्यूअर’। मार्केट में ऐसे और भी बहुत से सॉफ्टवेर है जो की काफी कीमत के होते हैं (दोनों के पास इंटनेट होना अवश्यक है।) आप इस सॉफ्टवेयर को निम्न लिंक से डाउनलोड कर सकते हैं -
http://www.teamviewer.com/en/download/index.aspx
इस सॉफ्टवेयर को चलाना भी आसान है। दोनों कंप्यूटर पर टीम व्यूअर  डालिए फिर अपने दोस्त से उसका आईडी और पासवर्ड पूछ कर अपने टीम विवर के आईडी और पासवर्ड वाले स्थान में डाल दीजिए। ऐसा करने पर आपके दोस्त का कंप्यूटर दूर बैठे-बैठे ही आपका हो जायेगा और जो भी कुछ आप अपनी स्क्रीन पर दिखने वाली एक नई विंडो में करेंगे वह आप के दोस्त के कंप्यूटर में होता जाएगा। फाइल ट्रान्सफर में जा कर अपने यहाँ से बड़ी फाइल को  भेज भी सकते है साथ ही आप बड़ी से बड़ी फाइल दोस्त के कंप्यूटर से ले भी सकते है।
तो क्लिक कीजिये और डाउनलोड कीजिये




कम्प्यूटर का विकास एवं पीढियाँ (Evolution and Generations of Computers)

कम्प्यूटर का विकास (Evolution of Computers)
विलक्षण क्षमता तथा त्वरित गति वाला आधुनिक कम्प्यूटर कोई ऐसा आविष्कार नहीं है जो किसी अकेले व्यक्ति के मस्तिष्क की उपज हो। आधाुनिक कम्प्यूटर की संकल्पना को साकार होने में हजारों वर्ष लगे हैं। यह पिछले कई हजार वर्षों में अनेक व्यक्तियों द्वारा किए गए अनगिनत आविष्कारों, विचारों तथा विकास का समन्वित परिणाम है।



                                              एबेकस
लगभग 3000 वर्ष ईसा पूर्व में मीसोपोटामिया के लोगों ने अनजाने में ही कम्प्यूटर युग की नींव रखी। उन्होंने मनकों और तार से गिनती गिनने का सबसे पहला उपकरण बनाया। लगभग 600 वर्ष ईसा पूर्व में चीनियों ने इस उपकरण में कुछ सुधार किए जिससे इस उपकरण द्वारा गणना करना और आसान हो गया। इस उपकरण को एबेकस कहा गया। उस समय चीन के अलावा जापान में भी इस उपकरण का उपयोग हुआ करता था। जापानी इसे सारोबान कहते थे। यह जानना रुचिकर होगा कि बहुत से चीनी लोग आज भी अपने रोजाना के व्यापारिक और लेन-देन के कामों में एबेकसका ही उपयोग करते हैं। 1991 में चीन में एबेकस की जानकारी रखने वालों की एक प्रतियोगिता हुई जिसमें24 लाख लोगों ने भाग लिया। अनेक चीनी लोगों का कहना है कि एबेकस कम्प्यूटर से भी ज्यादा तेज है। हमारे देश में भी प्राथमिक विद्यालयों की प्रारम्भिक कक्षा में बच्चों को अंक गणित के सिद्धान्त समझाने में इसका उपयोग किया जाता है।


नेपियर्स बोन्स
इसके बाद जब भारत में शून्य का आविष्कार हुआ तो प्रारम्भिक कम्प्यूटर में और परिवर्तन होने लगे। समय बीतता रहा, विकास चलता रहा। 17वीं शताब्दी के प्रारम्भ में स्काटलैण्ड के एक गणितज्ञ जॉन नेपियर को लधुगणक बनाने का विचार आया और उन्होंने ही बाद में गणना करने वाली ऐसी युक्ति बनाई जिससे बड़ी-बड़ी तथा दशमलव वाली संख्याओं का गुणा करना बहुत आसान हो गया। इस युक्ति को नेपियर्स बोन्स कहा गया।
सन 1642 में फ्रांसीसी गणितज्ञ ब्लेज एपास्कल ने मात्र बीस वर्ष की उम्र में विश्व का पहला यान्त्रिक केलकुलेटर बनाया जो दशमलव प्रणाली की जोड़-बाकी कर सकता था। इसे पास्कलाइन नाम दिया गया। यह अनेक चक्रों गरारियोंतथा बेलनों से निर्मित था। यह उपकरण उसी प्रकार कार्य करता था जिस प्रकार वर्तमान वाहनों में किलोमीटर मापने के लिए माइलोमीटर काम करते हैं। तत्पश्चात 1671 में जर्मनी के गॉटफ्रीड लिबनिज ने पास्कलाइन में कुछ परिवर्तन किया जिससे इस केलकुलेटर द्वारा गुणा एवं भाग कर पाना भी सम्भव हो गया।

सन 1801 में जैकार्ड ने कपड़े बुनने की मशीन का आविष्कार किया जिसे लूम कहा गया। इस मशीन की यह विशेषता थी कि इसमें कपड़े के पैटर्न को कार्ड-बोर्ड के छिद्र युक्त पंच कार्डों द्वारा नियन्त्रित किया जाता था। इस सिद्धान्त का उपयोग बाद में कम्प्यूटर में सूचना को पंचकार्ड पर संग्रहित करने में किया जाने लगा।
किन्तु आधुनिक कम्प्यूटर की संकल्पना ने1821 में आकार लेना आरम्भ किया। एक अंग्रेज वैज्ञानिक चार्ल्स बैबेज ने एक के बाद एक तीन स्वचालित यान्त्रिक संगणक के निर्माण का प्रयास किया। इन्हें डिफरेंस इंजिन नाम दिया गया। पहला यन्त्र स्वचालित केलकुलेटर का आरम्भिक सम्पूर्ण डिजाइन था। बैबेज निरन्तर 12 वर्षों तक इसे बनाने का प्रयास करते रहे। अभी यह आधा ही बना था कि उन्होंने अपना दूसरा यन्त्र बनाना शुरू कर दिया जो पहले से हल्का तथा तेज चलने वाला था। किन्तु इसका निर्माण पूरा होता उससे पहले उन्होंने इससे भी बेहतर अपना तीसरा यन्त्र बनाना प्रारम्भ किया। पूरा यह भी नहीं हुआ। यद्यपि, बाद में 1843 में पहला यन्त्र बना और स्वीडन में प्रदर्शित किया गया।


इसी क्रम में बैबेज ने 1833 में एक और संगणन यन्त्र का निर्माण आरम्भ किया जिसे वैश्लेषिक यन्त्र कहा गया। एनेलेटिकल इंजिन को सही अर्थो में आज के आधुनिक कम्प्यूटर का पूर्वज कहा जा सकता है। वास्तव में बैबेज के एनेलेटिकल इंजिन का विधिवत डिजाइन कभी बना ही नहीं,किन्तु बैबेज ने वे मूलभूत सिद्धान्त अवश्य स्थापित कर दिए जिन पर आज के कम्प्यूटर काम करते हैं। चकित करने वाली बात यह है कि इसकी अनेक विशेषताएं आज के इलेक्ट्रानिक कम्प्यूटर के समान थीं। इसके डिजाइन में आज के कम्प्यूटर जैसे केन्द्रीय प्रोसेसर, संग्रहण क्षेत्र, मैमोरी और इनपुट-आउटपुट युक्तियां आदि सभी कुछ था। यहां तक कि कार्ड पंच करने की पद्धति भी बैबेज ने ही पहली बार प्रस्तुतकी। इन सब योगदानों के कारण ही चार्ल्स बैबेज को कम्प्यूटर का जनक कहा जाता है।

सन 1887 में अमेरिका के हर्मन हॉलेरिथ ने सबसे पहली विद्युत यान्त्रिक कार्ड पंच सारणी मशीनबनायी। इस मशीन में बैटरी से संचालित स्विच और गियर थे जो अत्यधिक आवाज किया करते थे। हॉलेरिथ की इस मशीन में पंच कार्ड का उपयोग होता था। उन्होंने कोड विकसित किए थे जिन्हें हॉलेरिथ कोड कहते हैं। इन कोड के द्वारा पंच कार्ड में सूचना को संग्रह करना सम्भव हो गया । पंच कार्ड को टाइपराइटर जैसी मशीन से पंच किया जाता था। पंच कार्ड कम्प्यूटर में सूचना निवेश का सबसे पुराना माध्यम है।
मानक पंच कार्ड लगभग 7.37 इंच चौड़ा एवं 3.25 इंच लम्बा होता है। इसकी मोटाई 0.001 इंच होती है। इसमें 80 अक्षर लिखे जा सकते हैं। पंच कार्ड में जो छिद्र होते हैं वे 1 प्रदर्शित करते हैं व जहां छिद्र नहीं होते वे 0 प्रदर्शित करते हैं। हॉलेरिथ मशीन का प्रयोग अमेरिका के जन गणना विभाग द्वारा 1890 के जनगणना सम्बन्धी आंकड़ों को संकलित करने के लिए किया गया। आंकड़े संकलन में कुल तीन वर्षों का समय लगा, जबकि बिना इस मशीन के इसे करने में एक दशक लग जाता। यद्यपि इसकी तुलना में, आधुनिक कम्प्यूटर यह कार्य केवल कुछ घंटों में ही कर सकते हैं।

1924 में अमेरिका में कम्प्यूटर बनाने वाली पहली कम्पनी इन्टरनेशनल बिजनेस मशीन कार्पोरेशन प्रारम्भ हुई, जो आज भी दुनिया की सबसे बड़ी कम्प्यूटर निर्माता कम्पनी है।
1943 में अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञानी हावर्ड आइकन ने आई.बी.एम. के सहयोग से मार्क-I नामक विद्युत-यांत्रिक कम्प्यूटर बनाया। यह कम्प्यूटर 51 फुट लम्बा और 8 फुट ऊँचा था। इसमें 0.75 मिलियन अवयव लगे थे तथा एक हजार कि.मी. से अधिक लम्बे तार का उपयोग किया गया था। यह मात्र 5 सैकण्ड में दो 10-अंकीय संख्याओं को गुणा कर सकता था जो उस समय के लिए रिकार्ड था। इसमें 23 अंकों वाली दशमलव प्रणाली की 72 संख्याओं को संग्रह किया जा सकता था। इसमें पंच कार्डो के स्थान पर पंच पेपर टेप का उपयोग किया गया था।

इलेक्ट्रॉनिक कम्प्यूटर (Electronic Computer)
अब तक विकसित कम्प्यूटर विद्युत-यान्त्रिक थे। इनमें कई गम्भीर कमियां थीं। एक तो इनकी कार्य गति धीमी थी दूसरे यान्त्रिक कलपुर्जों के कारण इनमें सूचनाओं का संचार विश्वसनीय नहीं होता था। इनके अलावा कोई भी विशेष अभिकलन करने से पूर्व कम्प्यूटर को उस कार्य से सम्बन्धित निर्देश देने के लिए बहुत सारे स्विचों और यांत्रिक गियरों को हाथ से समायोजित करना पड़ता था। फलस्वरूप कम्प्यूटर की अपेक्षा आपरेटर को कहीं अधिक काम करना पड़ता था। अतः अब वैज्ञानिकों का सारा ध्यान एक इलेक्ट्रानिक कम्प्यूटर विकसित करने पर केन्द्रित हो गया जो ज्यादा तेज होने के साथ-साथ अधिक विश्वसनीय भी हो और उससे काम करने में अधिक श्रम भी न करना पड़े। इलेक्ट्रानिक कम्प्यूटर में गतिशीलता मात्र इलेक्ट्रान्स की होती है। इलेक्ट्रान्स का संचरण अत्यधिक विश्वसनीय एवं तीव्र गति से होता है जिससे कम्प्यूटर की गति बढ़ने के साथ-साथ उसकी विश्वसनीयता भी बढ़ जाती है। इलेक्ट्रानिक कम्प्यूटर पर कार्य करना भी आसान होता है।
पिछले साठ वर्षों में इलेक्ट्रानिक कम्प्यूटर की नई-नई तकनीकी का विकास बड़ी तेजी से हुआ है। इनका विकास इतनी तेजी  के साथ हुआ है कि  पांच साल पुराना मॉडल ऐतिहासिक वस्तु बन कर रह गया है।
कम्प्यूटर की पीढियाँ (Generations of Computers)
आज से लगभग 60 वर्ष पूर्व कम्प्यूटर ने वाणिज्यिक क्षेत्र में प्रवेश किया। इससे पूर्व इसका उपयोग विज्ञान,इंजीनियरिंग और सेना तक ही सीमित था। वाणिज्यिक कम्प्यूटर के विकास क्रम को कम्प्यूटर में प्रयुक्त नवीन तकनीकों के आधार पर पीढ़ियों में वर्गीकृत किया गया है। इस विकास क्रम में कम्प्यूटर की कार्य करने की गति,संग्रहण क्षमता और नये अनुप्रयोग प्रोग्रामों में वृद्धि हुई है जब कि इसके आकार और कीमत में कमी आई है। इसके उत्पादन में भी तेजी आई है और अब यह आसानी से उपलब्ध है। कम्प्यूटर के अब तक के विकास क्रम को पांच पीढ़ियों में विभक्त किया गया है। यद्यपि इन पीढ़ियों में थोड़ा बहुत अतिव्यापन है, किन्तु नीचे पीढ़ियों के सामने वर्णित काल अधिकांशतः स्वीकार किया गया है।
प्रथम पीढ़ी 1942.1955
इस पीढ़ी के कम्प्यूटरों में वैक्यूम ट्यूब का उपयोग होता था। वैक्यूम ट्यूब आकार में बड़ी थी अतः इस पीढ़ी के कम्प्यूटरों का आकार बहुत बड़ा था। इनकी कार्य करने की गति धीमी थी। इनमें इनपुट तथा आउटपुट के लिए पंच कार्डों का उपयोग होता था। आन्तरिक मैमोरी के लिए चुम्बकीय ड्रम प्रयुक्त होते थे। इनमें मशीनी भाषा तथा असेम्बली भाषा प्रचलित थी। इनका प्रयोग वैज्ञानिक अनुसंधान तथा वाणिज्यिक कार्यों जैसे वेतन बिल बनाना, बिल तैयार करना, लेखांकन करना आदि तक सीमित था। इस पीढ़ी के कुछ प्रमुख कम्प्यूटर निम्न थे-
इनिएक 1943.1946  (Electronic Numerical Integrator and Calculator)
यह प्रथम सामान्य उपयोग वाला इलेक्ट्रानिक था जिसे अमेरिका की पेन्नसिलवानिया विश्वविद्यालय के जे. प्रेस्पर एकर्ट तथा जॉन मचली ने बनाया। इसका पूरा नाम था। यह 50 फुट लम्बा तथा 30 फुट चौड़ा था।

इसका वजन 30 टन था और इसमें 18,000 वैक्यूम ट्यूबों का उपयोग हुआ था। इसे संचालित करने के लिए 1,50,000 वाट बिजली की आवश्यकता होती थी।
एडवेक 1946.1952 Electronic Discrete Variable Automatic Computer (EDVAC)
इनिएक के सलाहकार हंगरी के जॉन वॉन न्यूमेन की संग्रहित अनुदेश संकल्पना के आधार पर बनाया गया। इससे पूर्व कम्प्यूटरों में प्रोग्राम एवं डाटा संग्रह करना बहुत मुश्किल कार्य था।
          प्रथम पीढ़ी के अन्य महत्वपूर्ण कम्प्यूटर  EDSAC (1947-49),  MANCHESTER MARK-I (1948), UNIVAC (1951) आदि थे।
प्रथम पीढ़ी के कम्प्यूटरों में कई कमियां थी। ये आकार में बहुत बड़े थे। अधिक ताप से प्रायः इनकी ट्यूब जल जाया करती थीं। इनके खराब होने की सम्भावना अधिक रहती थी। इनका रख-रखाव बहुत मंहगा पड़ता था। विद्युत खर्च बहुत अधिक था। इनकी कार्य करने की गति धीमी थी। इनके लिए वातानुकुलन आवश्यक था। पंच कार्ड/टेप के उपयोग के कारण इनमें इनपुट-आउटपुट काफी धीमा होता था। इनकी मुख्य स्मृति (Main Memory) बहुत कम थी। प्रोग्रामिंग क्षमता भी बहुत कम थी। इनका बहुत ही सीमित उपयोग था।
द्वितीय पीढ़ी (Second Generation) 1955-1964
       द्वितीय पीढ़ी के कम्प्यूटर ट्रांजिस्टरों पर आधारित थे। ट्रांजिस्टर का आविष्कार 1947 में बेल लेबोरेट्रीज द्वारा किया गया था। ट्रांजिस्टर एक सॉलिड स्टेट युक्ति है जो अर्द्ध चालक धातु से बना होता है। ट्रांजिस्टर का वही कार्य था जो प्रथम पीढ़ी के कम्प्यूटरों में ‘‘वैक्यूम ट्यूब‘‘ का था। किन्तु इनका आकार वैक्यूम ट्यूब की तुलना में बहुत छोटा था और ये अधिक विश्वसनीय तथा अपेक्षाकृत अधिक तीव्र गति से कार्य करने में सक्षम थे। इनमें विद्युत की खपत भी बहुत कम होती थी।
इस समय स्मृति  (Memory) की तकनीक में भी सुधार हुए। 1960 के दशक में पूर्णतया ट्रांजिस्टर तकनीक पर आधारित प्राथमिक मैमोरी ;च्तपउंतल डमउवतलद्ध उपलब्ध हो गई। द्वितीयक मैमोरी (Primary Memory) के लिए चुम्बकीय टेप और डिस्कों का प्रयोग प्रारम्भ हुआ जो आज भी प्रचलित है।
       ट्रांजिस्टर के उपयोग से कम्प्यूटरों का आकार बहुत छोटा हो गया, साथ ही अधिक तापमान की समस्या भी बहुत हद तक कम हो गई। इसी कारण इनकी विश्वसनीयता भी बढ़ी । छोटे आकार के कारण आन्तरिक मैमोरी को भी बढ़ाया जा सका। इनकी कार्य गति भी बढ़ी तथा पहले से कहीं अधिक अच्छी इनपुट-आउटपुट युक्तियों का उपयोग किया जाने लगा। कम्प्यूटरों की लागत मूल्यों में भी कमी आई।
इस पीढ़ी में उच्च स्तरीय प्रोग्रामिंग भाषाओं का विकास हुआ, जैसे- BASIC, COBOL, FORTRAN आदि। इन उच्च स्तरीय भाषाओं के प्रादुर्भाव से प्रोग्रामिंग का कार्य आसान हो गया। इस पीढ़ी के कम्प्यूटरों के अनुप्रयोग क्षेत्रों का भी विस्तार हुआ, जैसे वायुयान के यात्रियों के लिए आरक्षण, प्रबंधन सूचना प्रणाली, इंजिनियरिंग, वैज्ञानिक अनुसंधान आदि में भी इनका उपयोग होने लगा।
IBM-70 सीरीज, IBM-1400 सीरीज, IBM-1600 सीरीज, HONEYWELL-400  से 800
सीरीज, CDC-3600 आदि इस पीढ़ी के कुछ प्रमुख कम्प्यूटर थे।


तृतीय पीढ़ी (Third Generation) 1964-1975
इस पीढ़ी के कम्प्यूटरों में ट्रांजिस्टरों का स्थान एकीकृत परिपथ ने ले लिया। इन्हें आई.सी. कहा जाता है।  यह पीढ़ी SSI पर आधारित है।  (SSI - Small Scale Integrator)  आई.सी. एक छोटा सा, आयताकार चपटा टुकड़ा होता है जिसमें हजारों ट्रांजिस्टर तथा अन्य इलेक्ट्रानिक तत्व निहित होते हैं। अपने छोटे चपटे आकार के कारण ये चिप के नाम से अधिक लोकप्रिय हैं। आई.सी. के उपयोग से कम्प्यूटरों का आकार और छोटा हुआ, गति तीव्र हुई, मैमोरी बढ़ी तथा लागत में कमी आई। साथ ही इनकी विश्वसनीयता भी और अधिक बढ़ी।

इस समय कम्प्यूटरों के मानकीकरण की आवश्यकता अनुभव हुई। इससे पूर्व सभी कम्प्यूटर निर्माता अपने हिसाब से सॉफ्टवेयर का निर्माण कर रहे थे और उनमें आपस में कोई तालमेल नहीं था। फलस्वरूप तैयार किए जाने वाले प्रोग्रामों की लागत ज्यादा पड़ती थी। अतः सॉफ्टवेयर निर्माण के लिए मानक आधार तय किए गए।
इस काल में विकसित महत्वपूर्ण कम्प्यूटर  IBM-360, ICL-1900, IBM-370, VAX-750 आदि थे.
चतुर्थ पीढ़ी (Fourth Generation) 1975 से अब तक
इस पीढ़ी के कम्प्यूटरों में बड़े पैमाने के एकीकृत  परिपथ  (Very Large Scale Integrated Circuits - VLSI) प्रयुक्त हुए। इन परिपथों में एक इंच के चौथाई भाग में लाखों ट्रांजिस्टर और अन्य इलेक्ट्रानिक घटक समाए होते हैं। अतः इन परिपथों को माइक्रोचिप कहा जाने लगा। पहला माइक्रोचिप 1970 में  इन्टेल कॉरपोरेशन ने  Intel 4004 तैयार किया। इस छोटे से चिप को माइक्रो प्रोसेसर कहा जाने लगा। माइक्रो प्रोसेसर युक्त कम्प्यूटर को ही माइक्रो कम्प्यूटर कहा जाता है।
माइक्रो प्रोसेसर के उपयोग से इस पीढ़ी के कम्प्यूटरों का आकार अत्यधिक छोटा हो गया। फलस्वरूप अब तक जिन कम्प्यूटरों के लिए बड़े-बड़े कक्षों की आवश्यकता होती थी वो अब टेबिल पर रखे जाने लगे  (Desktop Computer) . आप अपने विद्यालय में जिन कम्प्यूटरों का उपयोग करते हैं वो चौथी पीढ़ी के ही कम्प्यूटर हैं। और अब तो गोद में रख कर संचालित करने वाले लैप टॉप एवं हथेली में रखने वाले पाम टॉप कम्प्यूटर भी आ गए हैं।

माइक्रोप्रोसेसर आधारित इस पीढ़ी के कम्प्यूटरों की कार्य करने की गति अकल्पनीय ढंग से बढ़ी है। इनकी क्षमता,मैमोरी और विश्वसनीयता में भी आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। बहु आयामी होने के कारण उपयुक्त प्रोग्रामिंग के द्वारा इनका कार्य क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत हो गया है। ये सही अर्थों में पूर्ण जनरल परपज कम्प्यूटर  (Totally General Purpose Computer)  हैं। जीवन का शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र बचा है जहां कि इनका उपयोग नहीं हो रहा हो। आज इनकी कीमत भी इतनी कम हो गई है कि एक साधाहारण व्यक्ति भी एक घरेलू कम्प्यूटर का खर्च वहन कर सकता है।
आकार के आधार पर इस पीढ़ी के कम्प्यूटर माइक्रो कम्प्यूटर (डेस्कटॉप, लैप टॉप, पाम टॉप), मिनी कम्प्यूटर, मेन फ्रेम कम्प्यूटर तथा सुपर कम्प्यूटर में वर्गीकृत किये जाते हैं।
माइक्रोप्रोसेसर पर आधारित पहला PC 1970 में MITC नामक कम्पनी ने बनाया। इसका नाम ALTAIR था जोINTEL-8008 माइक्रो प्रोसेसर पर आधारित था। 1978 से IBM कम्प्यूटरों की श्रृंखला प्रारम्भ हुई जो सबसे सफल रही। इस श्रृंखला का पहला लोकप्रिय कम्प्यूटर माइक्रो प्रोसेसर 80186 पर आधारित था। बाद में  80286(1983), 80386(1986), 80486(1989), पेन्टियम. I  (1993), पेन्टियम. II (1997), पेन्टियम. -III (1999) पेन्टियम. IV (2000)  उपलब्ध हुए। इनके अतिरिक्त एप्पल, कॉम्पैक एवं हैलवेट पैकार्ड कम्पनी के कम्प्यूटर भी लोकप्रिय हुए हैं।

पांचवी पीढ़ी  (Fifth Generation)
ये कम्प्यूटर अभी विकास की अवस्था में हैं। इनमें तर्क करने, सोचने-समझने, निर्णय लेने आदि बौद्धिक क्षमताओं का विकास करने के प्रयास किए जा रहे हैं। ये कम्प्यूटर वर्तमान के कम्प्यूटरों से अधिक तीव्र गति वाले, अधिक विश्वसनीय और जटिल तथा विषम परिस्थितियों में भी कार्य कर सकने में सक्षम होंगे। पांचवी पीढ़ी के कम्प्यूटरों में प्रोग्रामिंग की विधियां भी सरल हो जाएंगी। ये मानवीय भाषा तथा व्यवहार को भी समझने लगंेगे अतः इनपुट और कमाण्ड दोंनों ही के लिए और अधिक आसानी हो जाएगी। आने वाले समय में मोबाइल कम्प्यूटरों का प्रचलन बढ़ेगा क्योकि इनका आकार दिन-प्रतिदिन छोटा होता जा रहा है। यह पीढ़ी USLSI (Ultra Voilet Lager Scale Integration)पर आधारित है।



























































Thursday, 20 September 2012

पेनड्राइव को बूटेबल कैसे बनाए?

पेन ड्राइव को बूटेबल बनाकर उसके द्वारा हार्ड डिस्क के पार्टीशन बनाने एवं फोर्मेट करके winxp इंस्टाल करने के लिए आप को जिन चीजों की आवश्यकता होगी वो निम्न प्रकार हे | काम आरम्भ करने से पहले ये सारी चीजे आपके पास होनी चाहिए |
१.पेन ड्राइव कम से कम १ GB |
२.winxp की cd जिसके द्वारा आप आज तक winxp इंस्टाल करते आये हे | इस पूरी cd की सारी फाइल्स और फोल्डर को ctrl +A द्वारा सिलेक्ट करके अपने कम्प्यूर में एक फोल्डर बनाकर कोपी कर लीजिये |
.आप यह सुनिश्चित कर ले की आपके कम्प्यूटर का bios , usb पेन ड्राइव द्वारा बूट होने को support करता हे अथवा नही |
इस कार्य के लिए आपको जिन utilities की आवश्यकता होगी उनको मेने एक फोल्डर में इकठ्ठा करके जिप करके अपलोड कर दिया हे | में लिंक नीचे दे रहा हूँ | आप उसको डाउनलोड कर लीजिये |
http://www.mediafire.com/?sharekey=5…a154af670496da
अब इस डाउनलोड की हुयी फाइल किसी भी ड्राइव में जाकर extract कीजिये | इसको खोलने पर आपको एक फाइल मिलेगी जिसका नाम होगा USB_MultiBoot_10.cmd .आपको केवल इस फाइल पर ही डबल क्लिक करना हे | वास्तव में यह एक बेच फाइल हे जिसमे सारी कमांड्स एक एक करके क्रम में लिखी गयी हे |
एक आवश्यक बात-इस फोल्डर में कई सारी प्रोग्राम फाइल हे उन को डबल क्लिक बिलकुल न करे |